Friday, 11 September 2015


अपनी आँखों का समन्दर पिया है मैंने !
दाग दामन में नहीं दिल पे लिया है मैंने !!

खामोश मोहब्बत को दम तोड़ने भी दो !
ये जुर्म कुछ ऐसा संगीन किया है मैंने !!

क्या लेगा वो और भी इम्तिहान मेरा !
दिल; जिगर; जाँ  सब ही दिया है मैंने !!

फिक्र-ए-यार से जी का उकताना कैसा !
हर उस लम्हे को दिल में सिया है मैंने !!

मौत भी मुझसे मुत्मईन हो गई तन्हा !
ज़िन्दगी इस सलीक़े से जिया है मैंने !!

- " तन्हा " !!
12-09-2015



apni aakhon ka samandar piya hai maine !
dag damn me nahi dil par liya hai maine !!

khamosh mohabbat ko dam todne bhi do !
ya zurm kuch aisa sangeen kiya hai maine !!

kya lega wo or bhi imtehaan mera !
dil ; jigar ; jaan sab hi diya hai maine !!

fikr-e-yaar se jee ka uktana kaisa !
har us lamhe ko dil me siya hai maine !!

maut bhi mujhse mutmaeen ho gai tanha !
zindgi is saleeke se jiya hai maine !!

- " tanha " !!
12-09-2015


3 comments:

  1. तन्हा इंसान तन्हाई के आलम पर एक तन्हा लफ़्ज़ों की चादर दाल देता है और जब सहमता-सिकुड़ता कोई और तन्हा इंसान उसे ओड़ लेता है तो वो ठिठुरने लग जाता है- बेहद ख़ामोशी से सलीके से आपने ये ख़ूबसूरत कविता लिखी मगर तन्हाई ने उसे एक विधवा की सूनी मांग सा बना दिया जो दर्द देता है...माफ़ कीजियेगा दवा की तलाश में लोग आयेंगे तो और बीमार न हो जायेंगे ? घावों को हरा रखना क्या ठीक है ?

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    1. शालिनी जी ! धन्यवाद जो आपने अपने विचारों से परिचित कराया !

      दर्द भी क्या दर्द "तन्हा" जो धुँआ हो जाये !
      मेरी चादर बस मेरे पैरों के बराबर हो जाये !!

      कौन आता है महफ़िल में दवा की ख़ातिर..!
      तेरी ख़ातिर मेरा ज़ख्म ही इलाज़ हो जाये !!

      - " तन्हा " !!
      15-12-2015

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 25 जून 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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