Saturday, 27 June 2015



हाँ ; मैं ज़िन्दगी के साज़ पर हर रोज़ अब नये तराने लिखता हूँ !
न मिले थे तुम तो थे ज़िंदगी अब मिले तो अफ़साने लिखता हूँ !!

हाँ ; मैं ज़िन्दगी के साज़ पर हर रोज़,,,,,,

जानता था मैं कि तुम ना आओगे हर रोज़ इस गली में मगर !
शाम - ओ - सहर तेरे ना आने के अब लाख बहाने लिखता हूँ !!

हाँ ; मैं ज़िन्दगी के साज़ पर हर रोज़ ,,,,,,

"तन्हा" ही तुम आये थे क्यों "तन्हा" हो कर तुम गए भी क्यों !
उस रोज़ तेरे चले जाने के बाद अब हर रोज़ फ़साने लिखता हूँ !!

हाँ ; मैं ज़िन्दगी के साज़ पर हर रोज़ ,,,,,,

- " तन्हा " !!27-06-2015


han main zindgi ke saj par har roz ab naye tarane likhta hu !
na mile the tum to the zindgi ab mile to afsane likhta hu !!

han main zindgi ke saj par har roz,,,,,,,

janta tha main ki tum na aaoge har roz is gali me magar !
shaam -o- shahar tere na aane ke ab laakh bahane likhta hu !!

han main zindgi ke saj par har roz,,,,,,,,

"tanha" hi tum aaye the kyu tanha ho kar tum gaye bhi kyu !
us roz tere chale jane ke baad ab har roz phasane likhta hu !!

han main zindgi ke saj par har roz,,,,,,,

- " tanha " !!
27-06-2015


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