Wednesday, 25 February 2015



मेरे ज़नाज़े में न आये तेरे शहर के लोग !
हैं ये किस कदर पराये तेरे शहर के लोग !!

मोहब्बत का मसीहा जिन्हे समझते रहे !
ज़ख्म दे हैं मुस्कराये तेरे शहर के लोग !!

जिक्र-ए-उल्फ़त में है जिक्र तेरा हर बात में !
और मुझे हैं समझायें तेरे शहर के लोग !!

हूँ अपनी वफ़ाओं पर मैं इतराता बहुत !
मुझे ही बेवफ़ा बतायें तेरे शहर के लोग !!

हूँ पाबन्द-ए-वफ़ा तो क्यूँ मैं लब खोलूँ !
हैं तेरा नाम ले सताएं तेरे शहर के लोग !!

है मोहब्बत का दीवाना इक तेरे शहर में !
तन्हा कह के हैं बुलाएँ तेरे शहर के लोग !!

- " तन्हा " !!
01-04-2014

mere janaje me n aaye tere shahar ke log !
hai ye kis kadar paraye tere shahar ke log !!

mohabbat ka masiha jinhe samjhte rahe !
jakhm de hai muskuraye tere shahar ke log !!

jikr -e- ulfat me hai jikr tera har baat me !
or mujhe hain samjhaye tere shahar ke log !!

hun apni wafaou par mai itrata bahut !
mujhe hi be-wafa bataye tere shahar ke log !!

hun paband-e-wafa to kyu mai lab kholu !
hai tera naam le satayen tere shahar ke log !!

hai mohabbat ka deewana ek tere shahar me !
tanha kah ke hai bulaye tere shahar ke log !!

- " TANHA " !!
01-04-2014

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