Tuesday, 21 October 2014

उसने फिर मुझको इक किताब दी है !
बाद मुद्दत के हुस्न -ए -शराब दी है !!

अबकी मिल कर है उससे पूछना ये !
क्यूँ रुख-ए -जमाल को नक़ाब दी है !!


कर भी दो हुस्न को बरी वफ़ा से तुम !
इश्क ने ख़ुदा से आज फ़रियाद दी है !!

हुस्नपरी के मानिंद नहीं कोई "तन्हा" !
ये किसने सरे - राह यूँ आवाज़ दी है !!

- " तन्हा " !!
25-03-2014