Tuesday, 21 October 2014

उसने फिर मुझको इक किताब दी है !
बाद मुद्दत के हुस्न -ए -शराब दी है !!

अबकी मिल कर है उससे पूछना ये !
क्यूँ रुख-ए -जमाल को नक़ाब दी है !!


कर भी दो हुस्न को बरी वफ़ा से तुम !
इश्क ने ख़ुदा से आज फ़रियाद दी है !!

हुस्नपरी के मानिंद नहीं कोई "तन्हा" !
ये किसने सरे - राह यूँ आवाज़ दी है !!

- " तन्हा " !!
25-03-2014

Friday, 10 January 2014

चकोर की याद में है उदास चाँद भी !!!!




उम्र के 28 वे पायदान पर 1995 में डियर पार्क ( R.K.PURAM ) दिल्ली  में लिखी इक ग़ज़ल  As It Is .......


पहले एक शेर ....

चकोर की याद में है उदास चाँद भी !
मुफ़लिसी में फॅसा आज का इंसां भी !!

रक़ीबों की सोहबत का ये सिला है मिला !
थामे से थमा नहीं दौर -ऐ-तूफ़ान भी !!

...... ......
परिन्दे की परवाज़ का आग़ाज़ भी अंज़ाम भी !
असीरी में सय्याद के जान भी जहान भी !!

बाग़-ओ-ग़ुल के ख्वाब में दिल भी ईमान भी !
गिरफ्त में ज़ंज़ीरों की हसरत -ए-परवान भी !!

बाँजुओं में था कभी फ़लक भी उन्वान भी !
मुश्क़िलों में फँसी जान भी पहचान भी !!

रिहाई का तक़ाज़ा है दुश्वार भी आसां भी !
क़दम बा क़दम मिले राह भी बियावाँ भी !!

सीमतन के हाथों में तीर भी कमान भी !
क़त्ल करने को मुझे हुक्म भी फ़र्मान भी !!

सरकशी का सरंजाम सुब्हो भी शाम भी !
कल्म कर दो मेरा इल्म भी जुबान भी !!

रोता है ऐयारी पे अर्श भी असमान भी !
सलाख़ों में दफ्न है तन्हा-ऐ-एहसान भी !!

- " तन्हा " चारू !!
    25-02-1995

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


Wednesday, 8 January 2014

तूफाँ से आती है तपिश-ए-आब की झलक !




तूफाँ से आती है तपिश-ए-आब की झलक !
देती है ख्वाहिश पेंच-ओ--ताब की झलक !!

उलट दे सऱे - राह वो नक़ाब ऐ सबा !
दिखला दे फिर मुझे माहताब की झलक !!

फ़िर देखूँगा मोजिज़ तेरे इस कमाल को !
देखो अभी रंगीनिये -शबाब की झलक  !!

पेशानी पे होता सुर्ख वो दाग़ -ए -बोसा मेरा !
किस क़दर है ज़ाहिर तेरे इताब की झलक !!

खुशग़वार फ़िज़ा धुंधलकी शाम शबे स्याह !
हर पहर है तेरे इज्तिराब की झलक !!

अब्र उठा ;जाम उठा ; मस्त हो ;सलाम कर !
हो नुमायां बज़्म में आलमताब की झलक  !!

कैफ़-ए-कलाम-ए-"तन्हा" है मर्हलों के पार !
आती है इसमें बू-ए -इन्क़िलाब की झलक !!
  
                                                - " तन्हा " चारू !!
                                                     08-02-1997  

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!

तपिश             = गर्मी ; आकुलता ; बेक़रारी
आब                 = पानी
पेंच         = उलझाव ; घुमाव
ताब         = ताप, शक्ति, धीरज, क्रोध  
माहताब      = चाँद
मोजिज़      = चमत्कार दिखाने वाला ; जादूगर ; खुदा
रंगीनियेशबाब = हुस्न ; सौन्दर्य
पेशानी       = माथा ; ललाट
दाग़         = निशान, घाव का चिन्ह, कलंक, दोष, विपदा, हानि
बोसा        = चुम्बन          
इताब          = क्रोध, अप्रसन्नता, डाँट, दोष लगाना
इज़्तिराब     = अशान्ति, चिन्ता, घबराहट, बेचैनी  
बज़्म          = सभा, टोली (महफ़िल )
आलमताब    = सबको रोशन करने वाला ; खुदा !
कैफ़         = आनंद ; नशा
कलाम       = रचना ; कविता   
मर्हलों       = गंतव्य ; आखरी स्थान   
बू-एइन्क़िलाब= आजादी की महक ; क्रान्ति

Tuesday, 7 January 2014

बोलो न ; कब आओगे ? अब तुम ; कब आओगे ????

इक पुरानी डायरी में दफ्न 21-22 साल पहले ( 1992 -93 = ज़म्मू  ) में लिखी गई एक कविता  ………



बोलो न ; कब आओगे ?
जब ;
सुरमई शाम , अपने सुर्ख व रेशमी , आँचल पर !
दूर झिलमिलाते , सितारों को , टाँक रही होगी  !
जब ;
शीतल , मन्द ,
पागल पवन पुरवाई ,
उस आँचल को --
छू कर , हिला कर ,
लहरा कर , गिरा कर
सारे जहाँ को ;
मद मस्त बना रही होगी !
तब ;
तुम आओगे न  ???  बोलो न !
बोलो न ; कब आओगे ?
तब - जब ;
ढल चुकी रात , और अन्धियारी ,
होती जा रही होगी !
चूर - चूर हो कर ; बिखरे सपनों की
एक और ; गहरी सी पर्त ,
उस पर छा रही होगी !
तब - जब ;
उस टूटन की चुभन ,
यक़ीनन , मेरे चेहरे पर ,
आ रही होगी !
मेरे ;
टीसते - रिसते जख्मों पर ,
हल्की सी पड़ी पपड़ी
को भी दरका रही होगी !
तब - जब ;
तुम्हारी याद , तुम्हारा प्यार ;
मलहम सा बन कर
उस नासूर को अपने
दामन में छिपा कर
उस अँधेरे में आशा की ;
चन्द्र किरण दिखा कर !
हर पल - हर छड़ ;
मुझे ,
उस भँवर से निकाल कर
मेरा आधार बन रहा होगा !
मेरा सम्बल बन चुका होगा !!
तब ;
तुम आओगे न  ???  बोलो न !
बोलो न ; कब आओगे ?
या शायद तब ;
हाँ तब ;
जब ,
एक और सुबह मेरा ; इन्तज़ार कर रही होगी !
जब ;
हर घड़ी एक नया ; इसरार कर रही होगी !
जब ;
मुझ पर बीती हर बात मुझे बेक़रार कर रही होगी !
तब ; हाँ तब ;
उस सुर्ख व रेशमी ; आँचल को ,
उस दहकती सी चूड़ियों कि ; छनछनाहट को ,
उस काली पड़ चुकी ; मेहँदी को ,
मुझे ;
पहनाने ; सुनने ; देखने !
तुम तो आओगे न ?
मेरे आँखों से गिरते ; हर मोती को ,
मेरे डगमगाते से ; हर क़दम को ,
मेरे पीछे रह गई ; हर याद को ,
तुम ;
समेटने ; सम्हालने ; बिसराने !
तुम तो आओगे न ?
बोलो न !
बोलो न ; कब आओगे ?

अब तुम ; कब आओगे ????

- " तन्हा " चारू !!
  1992 - 93 ( ज़म्मू )

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!-

Friday, 3 January 2014

ज़िंदगी फिर आज ख़ुद को दोहराती है !




ज़िंदगी फिर आज ख़ुद को दोहराती है !
मेरी ज़बीं पर इमां का घर बनाती है !!

तेरे एहसास को खुशबू सा सहेजा था !
हवायें रोज़ जिसको बिख़ेर जाती हैं  !!

किस क़दर है तुझे प्यार मुझसे "तन्हा"!
हथेलियों की हिना याद तो दिलाती है !!

तेरे माथे की बिंदिया ओ कंगना पायल !
मेरा सुकूँ भी हया के साथ लिये जाती है !!

जिंदगी ! तेरे झूठे वादे पर ऐतबार कर !
मौत भी मुझसे मिलना टाल जाती है !!

तुम भी हो किस मिट्टी के साज़ "तन्हा"!
जिन्दगी न जिस पे कभी गुनगुनाती है !!

                                             -- " तन्हा " चारू !!
                                                    02-01-2014

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


Thursday, 2 January 2014

कल्म किया क्यूँ सर मेरा इसका अफ़सोस नहीं !



कैसा तीर फिर मेरे इस ज़िगर के पार गया !
दर्द उठा अश्क बहे या'नी जाँ का आज़ार गया !!

कल्म किया क्यूँ सर मेरा इसका अफ़सोस नहीं !
हाय ! मेरा वो नन्हा दिल मसला कई बार गया !!

बदसलूकी आज़माने उसकी बज्म ओ महफ़िल में !
जो गया इक बार गया मैं वहाँ हर बार गया !!

तंज कसे तेग़ खींचा सलीब पे "तन्हा "झूल गया !
देखो किस-किस ज़ानिब मैं अपनी जां वार गया !!

                                         - " तन्हा " चारू !!
                                              06-02-1997 

सर्वाधिकार सुरक्षित © अम्बुज कुमार खरे  " तन्हा " चारू !!


Wednesday, 1 January 2014

अधूरी दास्ताँ ....... !!!!

अधूरी दास्ताँ ....... !!!!

जब ;  
सुबह का सूरज ,
बर-बस
अपने आगमन की
दस्तक़ दे रहा होगा !
अपनी लालिमा को , अपने
दोनों हाथों से समेट कर
मेरे लजाये चेहरे पर
मलने की पुरकोश
कोशिश कर रहा होगा !
जब ;
उसकी हल्की , गुनगुनी गर्मीं
तुम्हारे हाथों के स्पन्दन सी
मेरे माथे पर
मेरे चेहरे पर
मेरे होठों पर
इक मधुर चुम्बन सी
अंकित हो रही होगी !
मैं ;
तुम्हारे ख्यालों में
डूबती - उतरती
उन विचारों की सुनहली नदी में
अपने जीवन की
कश्ती को
तुम्हारी हथेली की
चन्द रेखाओं में
उतार कर
तुम्हारे विश्वास को अपना
मांझी व पतवार ; बना कर !
मैं निश्चिन्त हो जाऊँगी !
फिर ;
तुम्हारे संकल्प के
सीने में अपना ; मुख छिपा कर !
अपने नर्म व नाज़ुक
जज्बातों से तुम्हे
सहला कर !
धीरे से ;
तुझे उस नींद से
उठा कर
अपनी अधूरी दास्ताँ सुनाऊँगी !
और ख़ुद ;
तुम्हारे आग़ोश में
समा कर !
बेफ़िक्र हो
खो जाऊँगी ; सो जाऊँगी !!

n      " तन्हा " चारू !!